Tagged: भावपूर्ण कविता

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माँ तूझे भूला ना पाया !

  माँ तूझे भूला ना पाया !   आलोक पाण्डेय  कविता माँ! एक दिवस मैं रूठा था बडा ही स्वाभिमानी बन , उऋण हो जाने को , तुमसे भी विरक्त हो जाने को, त्यागी बन...

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दालान के वे दिन

  दालान के वे दिन ! _______________ वर्ष के सबसे काठिन्य दिनों में भी , बसंत में परिवेष्टित डूबा हुआ , न कुंठित न स्तम्भित श्वास तरंगी प्रतिक्षण शून्य में भी निरत रचने पर्वत...