Tagged: देशभक्ति भावपूर्ण कविता

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संस्कृति प्रवीर संभालें

  संस्कृति प्रवीर संभालें !  आलोक पाण्डेय  घनाक्षरी समर साध रहा समय है , सुविचारों संस्कारों का , वीरों के बलिदानों पर , निंदित हर विकारों का ; अपनी छाती पर अपनी संस्कृति नहीं...

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मंगल – आह्वान

मंगल-आह्वान भावों के आवेग प्रबल मचा रहे उर में हलचल। कहते, उर के बाँध तोड़ स्वर-स्त्रोत्तों में बह-बह अनजान, तृण, तरु, लता, अनिल, जल-थल को छा लेंगे हम बनकर गान। पर, हूँ विवश, गान...

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पूछ रहा मूझसे स्वदेश

  पूछ रहा मुझसे स्वदेश ____________ पूछ रहा मुझसे हिमालय,पूछ रहा वैभव अशेष पूछ रहा क्रांत गौरव भारत का, पूछ रहा तपा भग्नावशेष अनंत निधियाँ कहाँ गयी,क्यों आज जल रहा तपोभूमि अवशेष; कैसे लूटी...