मीरा – तुम मुझे बेहद पंसद हो Hindi Poetry

मीरा 
तुम मुझे बेहद पंसद हो
इसलिये नहीं कि तुम कृष्ण भक्त हो
पसंद हो क्यूँकि स्त्री इतिहास में
तुम एक सशक्त स्त्री हो

महल बना पिंजरा सोने का
सांमती युग की थी मनमानी
गिरधर में आकाश था दिखता
स्वाधीनता की हुयी तुम दीवानी

मेरी नजर में तुम योद्धा स्त्री थी
जो परंपराओं से भिड़ रही थी
कृष्ण नाम को हथियार बना
धर्म युद्ध तुम लड़ रही थी

भोज की चिता पे सती होना
ज़ुल्म कहाँ था यह थोड़ा
कृष्ण की सुहागिन बता
तुमने इक कुरिति को तोड़ा

अमृत मान पी लिया जहर तानों का
अपनी राह चलने में यातना थी बड़ी
सोती रही लांछन के बिस्तर पे
छवि देख कान्हा की सर्प बेड़ी तोड़ी

पार की लक्ष्मण रेखा समाज की
बदनामी भी लगी तुम को मीठी
निंदा की परवाह किये बिन मीरा
चलती रही तुम चाल अनुठी

घुंघट में कैद रहती हो जहाँ नारी
नाची घुँघरू बाँध,दे चुनौती रानी
‘अपणों घर का परदा कर ले
मैं अबला बौराणी’

छंदों में तुम्हारे पीड़ा नारी की दीखती है
लोक लाज के चलते स्त्री स्त्री को छलती है
जली कटी सुनाते सास ननद भौजाई
देवर राणा ने बार बार मौत भिजवाई

कुलीन स्त्री होकर घर तजना जटिल था
गौतम भी स्त्री होते तो बुद्ध होना मुश्किल था
कान्हा की प्रेमिका बन पार की देहरी
व्यक्त करना प्रेम भी विधवा को निषेध था

भक्ति की राह में भी कहाँ समानता थी
वहाँ भी स्त्री का स्थान न था कोई
कहकर तुमने लज्जित स्त्री उपेक्षा की थी
वृंदावन में कृष्ण सिवा पुरूष नहीं कोई

न सती न विधवा न रानी न नारी कुलीन
स्त्री अस्तित्व हेतू किये सभी अस्त्र विलीन
सींचती रही तुम आत्मा रहकर सवाधीन
नहीं माना स्वयं को किसी पुरूष के अधीन

इतिहास ने माना धुमिल कर दी तुम्हारी कहानी
जताया यही कि मीरा थी केवल कृष्ण दीवानी
तुम्हारे काव्य में पढ़ा विरह,न समझी नारी वेदना
अनसुना कर नारी विरोध सुनी सिर्फ़ कृष्ण वंदना

मीरा ! तुम मुझे बेहद पंसद हो
इसलिये नहीं कि तुम कृष्ण भक्त हो
पसंद हो क्यूँकि स्त्री इतिहास में
तुम एक सशक्त स्त्री हो

-मेजर(डा) शालिनी सिंह

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