ये दिल मिरा मचल गया

ये गुलबहार देख कर ये दिल मिरा मचल गया
बनूँ मैं सुर्ख़ इक शजर ये दिल मिरा मचल गया

बरस रही हों आसमां से वारिशें जो आग की
जलूँ मैं बनके गुलमुहर ये दिल मिरा मचल गया

ये सुर्ख छाँव आतिशी डरे न आफ़ताब से
परिन्दों का बनूँ बसर ये दिल मिरा मचल गया

गुजर रहे जो क़ाफ़िले उन्हें मैं छाँव दे सकूँ
बनूँ सफ़र की हमसफ़र ये दिल मिरा मचल गया

ये गर्मियों की दोपहर गज़ब का ठाती है क़हर
‘मुहर को देख बेखबर ये दिल मिरा मचल गया

सजी-सजाई नार-सी लगे शजर पलाश की
रहूँ यूँ मैं भी सज-सँवर ये दिल मिरा मचल गया

कभी न काटना शजर ये कह रही है गुलमुहर
न ख़्वाब में भी हो कहर ये दिल मेरा मचल गया

कुन्तल श्रीवास्तव.
मुम्बई.
स्वरचित.

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