मेरा क्या कसूर

पैरों में बांध ये घुंघरू मेरे मुझे बीच बाज़ार लाया गया है,
खुद को बचाकर कलंक वैश्या का मेरे सर लगाया गया है,

थी मैं नादान छोटी सी बच्ची जब लाई गई बाज़ार में,
पाप खुद किया और पापी मुझको बताया गया है।

ले रहे है मज़े मेरी आबरू को तार तार कर सरे बाज़ार,
और दामन मेरा मैलाकर मुझे बिकाऊ बनाया गया है।

क्या शिकवा करूँ मैं , इन समाज के ठेकेदारों से,
गुनाह खुद करते हैं ये, और दोषी मुझको कहलवाया गया है।

जिन पैरों की पाजेब को बजना था किसी के आँगन,
उस पाजेब को घर से निकाल बाजार में नचाया गया है।

जिंदगी बर्बाद मेरी करता रहा है समाज ये सदा से,
बेगुनाह और लाचार को ही तो सदा से सताया गया है।

“सखी” सोचे कहते हैं लोग इनको वैश्या, जिस्मफरोश,
ईमान कौड़ी में बेच, खुद को पाक साफ दिखाया गया है।

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