फुटबॉल वर्ल्ड कप में फ्रांस की जीत से सन्देश

फ्रांस ने वर्ल्ड कप के फाइनल में क्रोएशिया पर जीत दर्ज की।दोनों ही टीमों ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया एक छोटे से देश क्रोएशिया की टीम ने फुटबॉल वर्ल्ड कप के फाइनल में जगह बनाई और फाइनल में भी बहुत अच्छा प्रदर्शन किया यह सराहनीय है परंतु फ्रांस की वर्ल्ड कप की टीम में आधे से भी ज्यादा 23 में से 15 खिलाड़ी प्रबासी हैं।यह एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है क्योंकि वर्तमान दौर में पूरी दुनिया में मुख्यतः पश्चिमी देशों ,अमेरिका से लेकर यूरोप तक एवं एशिया में में भी प्रवासियों के खिलाफ एक अभियान चल पड़ा है। प्रवासियों को सरकारें बोझ मानती हैं,किसी भी तरह उनसे छुटकारा पाना चाहती है।उन्हें उनके गृह देश वापस भेज देना चाहती अथवा उनके प्रति संबेदनशील नहीं है प्रबासी अनेक देशों में ख़राब परिस्थितियों में रहने को मजबूर अथवा उन्हें देश छोड़ने को मजबूर किया जा रहा है,भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है , सरकारें उन्हें नागरिकों की तरह सम्मान अथवा सुविधाएं नहीं देती,स्थानीय नागरिकों का रवैया भी प्रवासियों के प्रति अच्छा नहीं रहता।

वर्तमान दौर के नेता भी इस दुर्भावना का पूरा राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश कर रहे हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तो अपना चुनाव ही प्रवासियों को अमेरिका से खदेड़ कर बाहर करने के मुद्दे पर लड़ा था। चुनाव जीत भी गए और अब उनकी मनमानी जारी है।

इंग्लैंड के यूरोपियन यूनियन से बाहर जाने के निर्णय में भी प्रवासियों का मुद्दा एक बड़ा मुद्दा था।

हाल ही में रोहिंग्याओं का मुद्दा ले लें उन्हें तो ना उनका गृह देश अपनाना चाहता है ना ही वे देश जहाँ उन्होंने शरण लेने की कोशिश की।

अक्सर प्रवासियों को विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा बोझ के रूप देखा जाता रहा है और बहां के नागरिकों को लगता है कि प्रवासियों के कारण उनकी नौकरियां छिन जायेगी,अव्यवस्था फैलेगी,प्रवासी अक्सर गरीब देशों से अमीर अथवा कहें की पश्चिमी देशों की और प्रवास करते है तब उन्हें वहां रंगभेद का सामना करना पड़ता है,उन्हें निम्न स्तर का जीवन जीना पड़ता है,उन्हें निम्न स्तर का माना जाता है, नागरिकों की तरह सम्मान भी नहीं दिया जाता। परंतु 2018 के फुटबॉल वर्ल्ड कप से एक बात तो स्पष्ट है की प्रवासी किसी देश पर बोझ नहीं हैं , नाही बे उस राष्ट्र का सम्मान कम करते है , नाही बे उस राष्ट्र के नागरिकों पर बोझ हैं।

2018 के फुटबॉल वर्ल्ड कप में लगभग सभी टीमों में अच्छी खासी संख्या में प्रवासी ख़िलाड़ी थे विशेष रूप से पश्चिमी देशों की टीमों में चाहे विजेता फ्रांस को ले ले जिसमे तो 23 में से लगभग 15 प्रवासी ख़िलाड़ी थे जिसमे मुस्लिम बहुसंख्या में थे,चाहे तो इंग्लैंड को देख ले अथवा बेल्जियम की टीम को देख लें अन्य देशों की टीमों में भी प्रवासी ख़िलाड़ी थे।इससे समाज की यह गलत धारणा की प्रवासी राष्ट्र पर बोझ होते है और वे उस राष्ट्र की उन्नति में सहयोग नहीं कर सकते तो टूटी है क्यूंकि प्रवासी खिलाडियों के बलबूते पर ही फ्रांस ने 1998(तब भी 11 ख़िलाड़ी प्रवासी मूल के थे) के पश्चात् दूसरी बार फुटबॉल वर्ल्ड कप जीता वो भी एक ऐसी टीम के साथ जिसमें अधिकतर खिलाड़ी प्रवासी हैं।

पश्चिमी देशों की सरकारों एवं नागरिकों का प्रवासियों के प्रति व्यव्हार ठीक नहीं है इसका नजारा वर्ल्ड वर्ल्ड कप के दौरान देखने को मिला जब रंग के आधार पर गोरे फुटबॉल समर्थकों ने रंगभेद के नारे लगाये एवं खिलाडियों को बेज्जत करने की कोशिश की।

विभिन्न राष्ट्रों को प्रवासियों के प्रति अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए क्युंकि इस फुटबॉल के वर्ल्ड कप से यह बात तो स्पष्ट है की एक विभिधता से भरी टीम बेहतर साबित हुई ,संगठन शक्ति भी बेहतरीन थी,एकता भी थी,तालमेल भी बेहतरीन था यही कारण रहा की टीम डटकर खेली और जीती।

इससे सन्देश साफ है की विभिधता से परिपूर्ण समाज भी फ्रांस की टीम की तरह समाज एवं मानवता के लिए विजेता सिद्ध होगा।

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