कविता – प्रभु का घर


“प्रभु का घर”

एक बात अंदर ही अंदर बङी कचोटती है मुझे
हे प्रभु जब तालों में बंद हुआ देखती हूँ तुझे

जो सर्व शक्तिमान है जिसनें रचा ये जहान है
उस परम आद्य शक्ति का कारावास स्थान है?

हंसी आती है मुझे तेरे सच्चे भक्तों के भोलेपन पर
जो अपनी गाढी कमाई अर्पण करें तेरी मूरत पर

जो कि काम आती है चंद धर्म के ठेकेदारों के
धन बल के दम पर जो प्रतीक हैं अत्याचारों के

अधर्म अनैतिकता का जो पर्याय बन जाते हैं
हत्या,बलात्कार जैसे जुर्म बेखौफ कर जाते हैं

धर्म के नाम पर रोज दंगे फसाद करवाते है
जिसकी चपेट में कितने ही बेगुनाह आ जाते हैं

तब हम भी उस अपराध का हिस्सा बन जाते है
अनजाने में ही सही पर एक गुनाह कर जाते हैं

कोई आसाराम, रामपाल या राम रहीम बनता है
अपने आप को जो ईश्वर का अवतार समझता है

हमारी भावनाओं से जो भद्दा खिलवाड़ करते हैं
धर्मगुरु और भक्ति के नाम को बदनाम करते हैं

माना कि इस संसार में दुख और पीङा सभी को है
पर उनसे मुक्ति पाने का ये तरीका सही नहीं है

सुना है ईश्वर भाव के भूखे होते है धन के नहीं
वो बसे हैं चराचर में किसी विशेष पत्थर में नहीं

आओ मन से उस परम पिता की पावन भक्ति करें
दीन दुखी और निर्बलों की हम सबल शक्ति बनें

कण कण में बसा है वो दाता सब देखता है
बस सच्चे मन से सुमिर लो कठौती में गंगा है

Written by – Sumitra Bishnoi

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