इंसानियत

इंसानियत
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न चढ़ाओ चादर मजार पर खुदा का नाम लेकर,
कभी तो सोच अपनी बदलो स्वार्थ से जुदा हो कर।

मजार के करीब पड़ा ठिठुर रहा था इंसान ,
देख न पाया तू पगले उसमे छुपा भगवान ।

जिसने बनाये चार पहर जिसने बनाई कायनात,
तू उसे देने चला है उपहारों की नई सौगात ।

वो भी खुदा का बंदा था तू भी खुदा का बंदा है,
नही चलता खुदा के दर पर कोई गोरख धंधा है ।

चला खुदा के दर पर तु करने अपनी मुराद पूरी ,
पर तु कभी न कर पाया किसी गरीब की मुराद पूरी।

जो तू न कर पाया वो खुदा कैसे कर पाएंगे ,
तड़पाया है औरों को तुमने खुदा तुम्हें तड़पाएँगे।

श्रद्धा सबुरी से सजा अनोखा जिनका द्वार है ,
उन्होंने ही दिया तुम्हें जीवन का उपहार है ।

उनके चरणों मे जगह मिलती उस इंसान को ,
इंसानियत भर कर आँखों में जो पूजे भगवान को ।

मंजू भारद्वाज

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